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ستوبا في اجانتا

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كهوف أجانتا (من 2 قبل الميلاد إلى 6 م)

كابتن شاب بالجيش البريطاني حداد كان في رحلة استكشافية خاصة لصيد النمور في صيف 1819. كما اقترب من بقعة على التل من حيث النهر واغورا ظهر ، سمع مكالمة شخص ما. عاد ليرى وكان راعي قرية يحاول أن يخبره بشيء بإيماءات يده. أدرك سميث أن الصبي كان يشير إلى جرف مرتفع فوق النهر ، وفي أي وقت من الأوقات ، أدرك سميث أن منطقة النمر بدأت عبر النهر.

حداد بدأ في النزول ببطء إلى أسفل التل عندما رأى رقعة من اللون الأحمر الذهبي بين بعض الأعمدة أو الأعمدة المنحوتة بالحجر. نسي سميث النمر ، واتجه نحو الهدف الجديد وسرعان ما دخل الكهف رقم 10. وضع الكابتن جون سميث مكانه في التاريخ كـ أول أوروبي يعثر على كهوف أجانتا. مثل النقوش القديمة الأخرى في الكهف ، نقش أيضًا بسكين على عمود خاص به "جون سميث ، سلاح الفرسان الثامن والعشرون و 28 أبريل 1819". لم يتخيل الكابتن سميث أبدًا أنه بعد مائتي عام ، سيتم تذكره إلى الأبد لأنه أعاد اكتشاف كهوف أجانتا ، ولم يكن جيدًا لأنه كان أيضًا أول من قام بتخريب اللوحات بنقوشه الخاصة.


مقال انتقال مجتمعنا

أدى الانتقال السلس لمجتمعنا ، من مجموعات بدوية إلى قذر ودول ، إلى تطور الأديان نتيجة إصلاح البيئات الاجتماعية والسياسية. حيث بدأت كمعتقدات كلامية أخرى تبنتها مجموعة بدوية صغيرة وتطورت ببطء إلى ديانات كاملة مع مرور الوقت. كان أقدم دليل على الديانة موجود في العالم في العصر الحجري الحديث. تعكس التماثيل الموجودة في تلك الفترة ، إلى جانب النصوص الدينية ، مجتمعًا دينيًا


अनुक्रम

गुफाएँ एक घने जंगल से घिरी، अश्व नाल आकार घाटी में अजंता गाँव से 3½ कि॰मी॰ दूर बनी है। गाँव महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर से 106 कि॰मी॰ दूर बसा है। इसका निकटतम कस्बा है जलगाँव، जो 60 कि॰मी॰ दूर है، भुसावल 70 कि॰मी॰ दूर है। इस घाटी की तलहटी में पहाड़ी धारा वाघूर बहती है। यहाँ कुल 29 गुफाएँ (भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग द्वारा आधिकारिक गणनानुसार) हैं، जो कि नदी द्वारा निर्मित एक प्रपात के दक्षिण में स्थित है। इनकी नदी से ऊँचाई 35 से 110 तक की है।

अजंता का मठ जैसा समूह है ، जिसमें कई विहार (मठ आवासीय) एवं चैत्य गृह हैं (स्तूप स्मारक हॉल) ، जो कि दो चरणों में बने हैं। प्रथम चरण को गलती से हीनयान चरण कहा गया है ، जो कि बौद्ध धर्म के हीनयान मत से सम्बन्धित है। वस्तुतः हिनायन स्थविरवाद के लिए एक शब्द है ، जिसमें बुद्ध की मूर्त रूप से कोई निषेध नहीं है। अजंता की गुफा संख्या 9، 10، 12، 13 15 (अंतिम गुफा को 1956 में ही खोजा गया और अभी तक संख्यित किया गया है।) को इस चरण में खोजा गया था। इन खुदाइयों में बुद्ध को स्तूप या मठ रूप में दर्शित किया गया है।

दूसरे चरण की खुदाइयाँ लगभग तीन शताब्दियों की स्थिरता के बाद खोजी गयीं। . कहते हैं। यह वत्सगुल्म शाखा के शासित वंश वाकाटक के नाम पर है। इस द्वितीय चरण की निर्माण तिथि कई शिक्षाविदों में विवादित है। हाल के वर्षों में कुछ बहुमत के संकेत इसे पाँचवीं शताब्दी में मानने लगे हैं। वॉल्टर एम ॰ स्पिंक، एक अजंता विशेषज्ञ के अनुसार महायन गुफाएँ 462-480 ॰ के बीच निर्मित हुई थी। महायन चरण की गुफाएँ संख्या हैं 1 ، 2 ، 3 ، 4 ، 5 ، 6 ، 7 ، 8 ، 11 ، 14 ، 15 ، 16 ، 17 ، 18 ، 19 ، 20 ، 21 ، 22 ، 23 ، 24 ، 25 ، 26 ، 27 ، 28 ، 29। गुफा संख्या 8 को लम्बे समय तक हिनायन चरण की गुफा समझा गया، किन्तु वर्तमान में तथ्यों के आधार पर इसे महायन घोषित किया गया है।

महायन، हिनायन चरण में दो चैत्यगृह मिले थे، जो गुफा संख्या 9 व 10 में थे। इस चरण की गुफा संख्या 12، 13، 15 विहार हैं। महायन चरण में तीन चैत्य गृह थे जो संख्या 19، 26، 29 में थे। अपने आरम्भ से ही अंतिम गुफा अनावासित थी। अन्य सभी मिली गुफाएँ 1-3 ، 5-8 ، 11 ، 14-18 ، 20-25 ، व 27-28 विहार हैं।

खुदाई में मिले विहार कई नापों के हैं، जिनमें सबसे बड़ा 52 फीट का है، प्रायः सभी वर्गाकार हैं। इनके रूप में भी भिन्नता है। कई साधारण हैं ، तो कई अलंकृत हैं ، कुछ के द्वार मण्डप बने हैं ، तो कई के नहीं बने हैं। सभी विहारों में एक आवश्यक घटक है— एक वृहत हॉल कमरा। वाकाटक चरण वालों में، कईयों में पवित्र स्थान नहीं बने हैं، क्योंकि वे केवल धार्मिक सभाओं एवम् आवास मात्र हेतु बने थे बाद में उनमें पवित्र स्थान जोड़े गये। फिर तो यह एक मानक बन गया। इस पवित्र स्थान में एक केन्द्रीय कक्ष में बुद्ध की मूर्ति प्रायः धर्म-चक्र-प्रवर्तन मुद्रा में बैठे हुए होती थी। जिन गुफाओं में नवीनतम विशेषताएँ हैं، वहाँ किनारे की दीवारों، द्वार मण्डपों पर और प्रांगण में गौण पवित्र स्थल भी बने दिखते हैं। कई विहारों के दीवारों के फलक नक्काशी से अलंकृत हैं। दीवारों और छतों पर भित्ति चित्रण किया हुआ है।

प्रथम शताब्दी में हुए बौद्ध विचारों में अन्तर से ، बुद्ध को देवता का दर्जा दिया जाने लगा और उनकी पूजा होने लगी। परिणामतः बुद्ध को पूजा-अर्चना का केन्द्र बनाया गया जिससे महायन की उत्पत्ति हुई।

पूर्व में، शिक्षाविदों ने गुफाओं को तीन समूहों में बाँटा था، किन्तु साक्ष्यों को देखते हुए और शोधों के चलते उसे नकार दिया गया। उस सिद्धान्त के अनुसार 200 ॰ पूर्व से 200 ई ॰ तक एक समूह ، द्वितीय समूह छठी शताब्दी का और तृतीय समूह सातवीं शताब्दी का माना जाता था।

आंग्ल-भारतीयों द्वारा विहारों हेतु प्रयुक्त अभिव्यंजन गुफा-मंदिर अनुपयुक्त माना गया। अजंता एक प्रकार का महाविद्यालय मठ था। ह्वेन त्सांग बताता है कि दिन्नाग ، एक प्रसिद्ध बौद्ध दार्शनिक ، तत्वज्ञ ، जो कि तर्कशास्त्र पर कई ग्रन्थों के लेखक थे ، यहाँ रहते थे। यह अभी अन्य साक्ष्यों से प्रमाणित होना शेष है। अपने चरम पर विहार सैंकड़ों को समायोजित करने की सामर्थ्य रखते थे। यहाँ शिक्षक और छात्र एक साथ रहते थे। यह अति दुःखद है कि कोई भी वाकाटक चरण की गुफा पूर्ण नहीं है। यह इस कारण हुआ कि शासक वाकाटक वंश एकाएक शक्तिविहीन हो गया ، जिससे उसकी प्रजा भी संकट में आ गयी। इसी कारण सभी गतिविधियाँ बाधित होकर एकाएक रूक गयीं। यह समय अजंता का अंतिम काल रहा।

यह एक प्रथम कदम है और इसका अन्य गुफाओं के समयानुसार क्रम से कोई मतलब नहीं है। यह अश्वनाल आकार की ढाल पर पूर्वी ओर से प्रथम गुफा है। स्पिंक के अनुसार इस स्थल पर बनी अंतिम गुफाओं में से एक है और वाकाटक चरण के समाप्ति की ओर है। हालाँकि कोई शिलालेखित साक्ष्य उपस्थित नहीं हैं फिर भी यह माना जाता है कि वाकाटक राजा हरिसेना इस उत्तम संरक्षित गुफा के संरक्षक रहे हों। . को आश्रय देना प्रसन्न कर सकता था। यहाँ दर्शित कई विषय राजसिक हैं।

इस गुफा में अत्यंत विस्तृत नक्काशी कार्य किया गया है ، जिसमें कई अति उभरे हुए शिल्प भी हैं। यहाँ बुद्ध के जीवन से सम्बन्धित कई घटनाएँ अंकित हैं ، साथ ही अनेक अलंकरण नमूने भी हैं। इसका द्वि-स्तंभी द्वार-मण्डप ، जो उन्नीसवीं शताब्दी तक दृश्य था (तब के चित्रानुसार) ، वह अब लुप्त हो चुका है। इस गुफा के आगे एक खुला स्थान था ، जिसके दोनों ओर खम्भेदार गलियारे थे। इसका स्तर अपेक्षाकृत ऊँचा था। इसके द्वार मण्डप के दोनों ओर कोठियाँ हैं। इसके अन्त में खम्भेदार प्रकोष्ठों की अनुपस्थिति बताती है कि यह मण्डप अजंता के अन्तिम चरण के साथ नहीं बना था ، जब कि खम्भेदार प्रकोष्ठ एक नियमित अंग बन चुके थे। पोर्च का अधिकांश क्षेत्र कभी मुराल से भरा रहा होगा ، जिसके कई अवशेष अभी भी शेष हैं। यहाँ तीन द्वार पथ हैं، एक केन्द्रीय व दो किनारे के। इन द्वारपथों के बीच दो वर्गाकार खिड़कियाँ तराशी हुई है ، जिनसे अंतस उज्ज्वलित होता था।

महाकक्ष (हॉल) की प्रत्येक दीवार लगभग 40 फीट लम्बी और 20 फीट ऊँची है। बारह स्तम्भ अन्दर एक वर्गाकार कॉलोनेड बनाते हैं जो छत को सहारा देते हैं ، साथ ही दीवारों के साथ-साथ एक गलियारा-सा बनाते हैं। पीछे की दीवार पर एक गर्भगृहनुमा छवि तराशी गयी है ، जिसमें बुद्ध अपनी धर्म-चक्र-प्रवर्तन मुद्रा में बैठे दर्शित हैं। पीछे، बायीं एवं दायीं दीवार में चार-चार कमरे बने हैं। यह दीवारें चित्रकारी से भरी हैं، जो कि संरक्षण की उत्तम अवस्था में हैं। दर्शित दृश्य अधिकतर उपदेशों، धार्मिक एवम् अलंकरण के हैं। इनके विषय जातक कथाओं، गौतम बुद्ध के जीवन، आदि से सम्बन्धित हैं।


وصف الكهوف

الكهف 1 هو دير مبني على شكل مربع. الكهف فناء مفتوح مع شرفة. يوجد تمثال لبوذا في وضع الجلوس ويداه في دارماتشاكرا برافارتانا مودرا. توجد أربع زنزانات على كل جانب يسار وخلفي وعلى الجدران اليمنى. هناك ثلاثة مداخل وبين المداخل ، تم نحت نافذتين مربعتين للحصول على الضوء داخل الكهف. تصور اللوحات في هذا الكهف مشاهد مختلفة من حكايات جاتاكا. أهم لوحتين هما Padmapani و Vajrapani. بعض اللوحات الأخرى تشمل sibi و Sankhapala و Mahajanaka وغيرها الكثير.

يقع هذا فيهارا بجوار Cave 1. يشتهر Cave 2 ببعض اللوحات الجميلة التي تم رسمها على الجدران والسقوف والأعمدة. تصور اللوحات همسة ، Vidhurapandita ، حكايات kshanti Jataka. ترتكز معظم اللوحات في الكهف 2 على نساء في أدوار بارزة. الكهف 2 مدعوم بالعديد من الأعمدة المزخرفة والمنحوتة بشكل جميل.

إنها فيهارا غير مكتملة

الكهف 4
إنه أكبر نهر فيهارا برعاية أحد الأثرياء المخلصين. يقع هذا في مستوى أعلى قليلاً مقارنةً بفيهارا الأخرى ربما لأن جودة الصخور كانت أفضل بكثير مقارنة بالمستوى الأدنى. يُعتقد أنه تم القيام به في القرن السادس. يحتوي الكهف على صورة لبوذا هو وضع الوعظ مع بوديساتفا على كلا الجانبين.

دير غير مكتمل أبعاده 10.32 × 16.8 م. فيما عدا إطار باب الكهف 5 لا يوجد به أعمال معمارية أو لوحات. يحتوي إطار الباب على شخصيات نسائية من makaras. ربما بدأ بناء الكهف في عام 465 م ولكن تم التخلي عنه لاحقًا بسبب المشكلات الجيولوجية.

وهو عبارة عن دير مكون من طابقين ويتكون من مقدس وقاعة على كلا المستويين. المستويين يعتبران كهف 6 سفلي وكهف 6 علوي. الشرفة ذات الأعمدة التي كانت موجودة في الكهف 6 السفلي لم تعد موجودة. تمثال بوذا في وضع التعليم على كلا المستويين. اكتمل المستوى الأدنى من cae 6 فقط ، بينما المستوى العلوي غير مكتمل. تم نحت الجدران وإطار باب الحرم بدقة شديدة.

وهو أيضًا دير ذو طابق واحد. يتكون من حرم ، وقاعة ذات أعمدة مثمنة وثماني غرف صغيرة للرهبان الذين يمكنهم أخذ قسط من الراحة أثناء سفرهم. عندما يدخل المرء الشرفة وينتقل أكثر إلى غرفة الانتظار ، يمكن للمرء أن يرى & # xa0 منحوتات جالسة مثل 25 بوذا منحوتًا جالسًا في أوضاع مختلفة على يسار غرفة الانتظار. قد يكون بسبب مشاكل جيولوجية الكهف 7 يتكون من رواقين فقط ، غربها جريها مع غرفة انتظار.

دير آخر غير مكتمل تم استخدامه لاحقًا كغرفة تخزين ومولد في القرن العشرين.

الكهف 9 هي واحدة من أقدم قاعات الصلاة (chaitya) في كهوف اجانتا. تم التنقيب عنه في القرن الأول قبل الميلاد. الممرات في الكهف مفصولة بـ 23 عمودًا. تحتوي القاعة أيضًا على ستوبا وتقف الستوبا على قاعدة أسطوانية في وسط الحنية. السقف مقبب ولدى ستوبا أيضًا مسار طواف حوله. تنتمي اللوحات في هذا الكهف إلى فترتين مختلفتين. واحدة في وقت التنقيب والفترة الأخرى حوالي القرن الخامس. تشمل بعض اللوحات وضع بوذا على الأعمدة ، وتشمل اللوحات خلف ستوبا لوحات بوذا وبادماباني وفاجراباني.

إنها قاعة صلاة كبيرة (chaitya) يُفترض أنها بنيت في القرن الأول بحبال مع الكهف 12 وهو عبارة عن vihara. يحتوي الكهف 10 على ممرين يفصل بينهما 39 عمودًا مع وجود ستوبا في نهاية الممر. ستوبا محاط بمسار pradakshina. الكهف له أهمية تاريخية حيث رأى ضابط الجيش البريطاني جون سميث القوس في أبريل 1819 وكان مهتمًا جدًا بهندسته. اللوحات تنتمي إلى فترتين. تصور بعض اللوحات في الكهف قصص سما جاتاكا وتشادانتا جاتاكا. هذا الكهف أكبر بكثير مقارنة بالكهف 9.

إنه مبنى فيهارا تم بناؤه في القرن الخامس. يتكون من قاعة بها مقعد كبير وست زنزانات. تنتهي القاعة الأخرى بمقدس به صورة لبوذا وهو جالس وأيضًا ستوبا غير مكتملة. بعض اللوحات الهامة تشمل Padmapani ، شخصية أنثوية ، وزوج من الطاووس.

وفقًا لعلماء الآثار ، ينتمي الكهف 12 إلى الفترة الأولى. تم تدمير الجزء الأمامي من هذا فيهارا بالكامل. فقط القاعة المركزية المكونة من أربع زنزانات بقيت سليمة. يقول نقش على الحائط أن تاجرًا يُدعى Ghanamadada قد أهدى هذا الكهف حوالي القرن الثاني قبل الميلاد.

الكهف 13 عبارة عن vihara صغير ينتمي إلى الفترة الأولى. وتتكون من قاعة بها سبع زنزانات وأيضًا سريرين حجريين.

الكهف 14 هو دير & # xa0 غير مكتمل.

تعود ملكية CAVE 15 إلى Hinayana وتم بناؤها في القرن الخامس. وهو عبارة عن vihara يتكون من ثماني قاعات زنزانات بها حرم وغرفة انتظار وشرفة بها أعمدة. يحتوي الحرم على صورة بوذا باعتباره الجلوس. الكهف 15A هو أصغر كهف به صالة وخلية واحدة على كل جانب.

يقع في وسط المكان الكهف 16 برعاية & # xa0 من قبل Varahadeva ، الذي كان وزيرًا في Vakataka king Harisena. إنه دير ماهايانا مع مدخل رئيسي ومدخلان ممران. القاعة الرئيسية وهي ساحة كاملة محاطة بـ 14 زنزانة. يحتوي الكهف 16 على العديد من اللوحات التي تحتوي على قصص من حكايات جاتاكا مثل Hasti و Mahaummagga و Sutasoma. يمتلك غاربها جرايها بوذا في دارما شقرا مودرا. هناك أيضًا لوحة تكون فيها الأميرة سونداري سعيدة جدًا عندما تلقت نبأ تحول زوجها إلى راهب. بعض اللوحات غير مكتملة.

إنها vihara التي تنتمي إلى طائفة الماهايانا. يحتوي الكهف 17 على رواق وغرفة انتظار والعديد من الأعمدة بتصميمات مختلفة وأبواب ونوافذ كبيرة عليها نقوش جميلة للإله والإلهة. يحتوي الكهف أيضًا على نقش طويل من الملك Upendragupta. ويعتقد أن الملك رعى أيضًا خمسة كهوف أخرى في أجانتا. هناك ثلاثون لوحة جدارية رئيسية في الكهف. & # xa0

يحتوي الكهف 17 على العديد من اللوحات الجميلة التي تشرح أوضاع بوذا المختلفة مثل السيخي وفيباسي وساكياموني وفيسفبهو وكاسيابا. العديد من قصص جاتاكا مثل hasti و Hamsa و Sarabha miga و Sama و Mahisa و sibi وغيرها الكثير.

إنها مساحة صغيرة مستطيلة & # xa0 مع عمودين مثمنين.

إنه Chaitya griha الذي ينتمي إلى القرن الخامس. تشتهر الكهف 19 بمنحوتاتها الجميلة. تم تزيين مدخل الكهف بشكل رائع بأشكال منحوتة لبوذا في أنماط مختلفة. تدعم الشرفة ركنان دائريان مزدان بنقوش زهرية وأكاليل منحوتة. يحتوي الكهف 19 أيضًا على شخصية Naga مع مظلة ثعبان تحمي بوذا.

يوجد أيضًا نوعان من الياكشا الضخمان المنحوتان على جانبي قوس تشيتيا. قاعة العبادة عبارة عن ممرات جانبية لها 15 عمودًا تقسمها إلى ممرات جانبية وصحن جانبي واحد. الجدران والأسقف داخل الممر مغطاة بلوحات. تم نحت تمثال بوذا واقفًا أمام ستوبا. تاج هذه الصورة يكاد يلمس السطح.

إنه دير يعود تاريخه إلى القرن الخامس. ربما تم التبرع به من قبل Upendragupta ، يتكون هذا vihara من شرفة بها زنزانة على كلا الجانبين. غاربها جريها لديها بوذا في وضع الوعظ. يوجد في الشرفة أيضًا نافذتان مقطعتان بالحجر لإدخال الضوء. إطارات الأبواب شبه هيكلية في الشكل.

إنه دير. لها شرفة و 12 عمود. هناك اثنتا عشرة خلية & # xa0 ، أربعة منها بها شرفات ذات أعمدة. تمتلك Garbha Griha معبود بوذا في وضع الوعظ.

وهي عبارة عن ساحة صغيرة بها شرفة أرضية وأربع خلايا غير مكتملة. تم نحت بوذا في برالامبا باداسانا مودرا. يمكن للمرء أيضًا ملاحظة الأشكال المرسومة لمانوشي بوذا.

هذا عبارة عن vihara غير مكتمل يتكون من أعمدة منحوتة بشكل معقد وأعمدة في حراس بوابات ناغا.

حتى هذه فيهارا غير مكتملة مع قاعة ، شرفة ذات أعمدة. معبود بوذا في غاربها جريها في وضعية برالامبا باداسانا مودرا.

وهو دير محفور على مستوى أعلى وليس له حرم.

إنها قاعة عبادة Chaitya griha تشبه الكهف 19. يحتوي الكهف على قاعة ممرات جانبية مع ممرات جانبية ويجلس صنم بوذا مع العديد من المودرات. تشمل إحدى الأعمال الفنية الرئيسية تصوير ماهابارينيرفانا لبوذا على جدار الممر الأيسر جنبًا إلى جنب مع الاعتداء على مارا بينما كان بوذا يقوم بالتكفير عن الذنب. في وسط الكهف توجد ستوبا التي بها صنم بوذا

إنه دير من طابقين. الطابق العلوي منهار جزئياً والطابق السفلي يتكون من قاعة داخلية وأربع زنازين وغرفة انتظار وغربها جريها.

إنه دير غير مكتمل

إنه chaitya غير مكتمل يقع بين الكهف 20 و 21.

من المفترض أن تكون واحدة من أقدم الكهوف التي تم اكتشافها عن طريق إزالة حطام الكهف 15 و 16. وتحتوي على نقشين & # xa0 بخط غير معروف.


كيف كان المستشرقون البريطانيون مسؤولين عن إعادة اكتشاف التاريخ الهندي

أدت الجهود البريطانية إلى اكتشاف العديد من المواقع التراثية ، بما في ذلك Sanchi Stupas وكهوف Ajanta ، وفك رموز نص Brahmi وبالتالي تمكين إعادة بناء جزء كبير من تاريخنا

البوابة الجنوبية لستوبا 1 في سانشي. الائتمان: Anandajoti Bhikkhu / Wikimedia Commons CC BY 2.0

لجيل تربى على انتقادات إدوارد سعيد ، قد يكون مفاجئًا أن المستشرقين البريطانيين هم من أعاد اكتشاف تراثنا الفني وجعلوه في متناول الجميع. اتخذت ما يسمى بـ "النظرة الاستعمارية" ، والتي يرفضها أتباع سعيد على أنها استيلاء استعماري ، شكل العديد من اللوحات والنقوش الرائعة من خلال زيارة الفنانين البريطانيين ، مثل توماس دانييل وويليام هودج ، قبل وقت طويل من اكتساب بريطانيا لأي طموحات إمبراطورية في الهند.

جانتار المنطار في دلهي. لوحة لتوماس وويليام دانيالز ، 1808. الائتمان: ويكيميديا ​​كومنز

ثم كان هناك السير ويليام جونز ، العالم الموسوعي اللامع الذي ساهم أكثر من أي فرد آخر في النهضة الثقافية الوطنية للهند. إلى جانب وظيفته اليومية كقاض في كلكتا ، درس جونز اللغة السنسكريتية وأتقنها ، وأنقذها من احتكار براهمين الضيق ، وترجم كلاسيكياتها واستخدم اللغة لفتح أمجاد ماضينا الهندوسي والبوذي المنسي منذ زمن طويل.

على عكس اليونان القديمة وروما ، لم يترك ماضي الهند الكلاسيكي وراءه أي تاريخ مكتوب ، لذلك كان لا بد من إعادة بنائه من الأجنحة المفقودة والكنوز المدفونة. في عام 1784 ، برعاية نشطة من الحاكم العام البريطاني الأول ، وارن هاستينغز ، أسس جونز الجمعية الآسيوية لتولي هذه المهمة العملاقة. أصبحت منارة لجيش ضخم من المتطوعين من الضباط المدنيين والعسكريين البريطانيين المتحمسين الذين جابوا mofussil عن الآثار والمشغولات اليدوية وكتب مقالات علمية عنها.

عندما عاد جونز إلى إنجلترا بعد عقد من الزمان ، تحطمت صحته بسبب إرهاق العمل ، استولى جيمس برينسيب ، وهو عالم متعدد الثقافات آخر ، على الرجل الآسيوي ، وكانت وظيفته اليومية في شركة الهند الشرقية بيناريس. أنتجت جهود برينسيب أكبر اختراق في التأريخ الهندي ، وفك رموز نص برهمي المنسي منذ فترة طويلة ومن خلاله اكتشاف الإمبراطورية الموريانية التي وحدت شبه القارة الهندية في القرن الثالث قبل الميلاد.

بدأت المهمة مع الأعمدة الجرانيتية الضخمة المصقولة ، وهي أثقل وزن يصل إلى 40 طنًا ، والتي ظهرت في جميع أنحاء شمال الهند ، منقوشة بما يشبه الدبوس. قضى برينسب سنوات عديدة في نسخ مئات النقوش المعدنية بشق الأنفس ثم جمعها مع تلك الموجودة على الأعمدة قبل أن يكسر أخيرًا رمز نص براهمي ويفك رموز الدبوس كمراسيم للإمبراطور موريان أشوكا.

جيمس برينسيب ، المسؤول عن فك شفرة نص براهمي من مراسيم أشوكا & # 8217s. الائتمان: ويكيميديا ​​كومنز

قدم برينسيب اكتشافاته في ورقة إلى آسيوي ، ثم عانى من انهيار جسدي وعقلي واضطر إلى نقله إلى منزله في إنجلترا ، حيث توفي بعد فترة وجيزة. أعلنت مراسيم أشوكا تحول الإمبراطور إلى البوذية ولكن لم يُعرف سوى القليل عن هذا الدين الغامض أو الرجل الذي أسسها.

كان اكتشاف روابط بوذا الهندية مرة أخرى من عمل المستكشفين البريطانيين المتفانين. في أواخر تسعينيات القرن التاسع عشر ، قام عالم طبيعي بريطاني ، سمع تقارير في بورما بأن بوذا كان بيهاريًا ، بتعقب آثار بود جايا البوذية.

في العقود التالية ، تم تأكيد الجذور الهندية لبوذا من خلال التنقيب في سلسلة من الأبراج الغامضة التي تشبه القبة. جاء اكتشاف سانشي لأول مرة في عام 1819 من قبل ضابط بالجيش البريطاني. لطالما دفن سانشي في الغابات ، وبالتالي هرب من الدمار إما من قبل النهضة الهندوسية البراهمانية التي قضت على البوذية الهندية أو الغزوات الإسلامية التي حطمت العديد من المعابد. أصبحت الأبراج مركزًا لمزيد من الحفريات من قبل الرجل الذي يعتبر والد علم الآثار الهندي ، الملازم ألكسندر كننغهام من المهندسين الملكيين.

في عام 1834 ، استخدم كننغهام مهاراته الهندسية للتنقيب في أعماق ستوبا الرئيسية في سانشي ، حيث اكتشف أدلة على أن البوذية كانت منتشرة على نطاق واسع لعدة قرون من فترة موريان وصولاً إلى إمبراطورية جوبتا. واصل التنقيب عن مجموعة كبيرة من المنحوتات البوذية في سارناث ، والتي شحَن أفضلها إلى كلكتا. في زيارة لاحقة ، شعر كننغهام بالفزع عندما اكتشف أن المنحوتات التي تركها وراءه تُستخدم لسد نهر قريب. كان ذلك نموذجًا للمعركة المستمرة التي خاضها المستشرقون البريطانيون لإنقاذ اكتشافاتهم من العادة الهندية المتمثلة في استخدام الأحجار القديمة لبناء جديد. بعد أربعين عامًا ، عندما اكتشف كننغهام أطلال وادي السند في هارابا ، وجد طوبًا من الموقع يُستخدم لوضع خط للسكك الحديدية.

بعد تقاعده من الجيش كجنرال ، أمضى كننغهام بقية حياته الطويلة في قيادة هيئة المسح الأثري للهند المنشأة حديثًا ، والتي لا تزال تدير تراثنا الفني. كان آخر اكتشاف كبير له هو Bharhut stupa ، المليء بالكنوز البوذية الموريانية التي أرسلها إلى متحف كلكتا ، ليتم ترميمها من قبل نائب الملك المتحمس ، اللورد كرزون.

العبادة في ستوبا ، وجدت في بهارهوت ستوبا. الائتمان: دوغلاس جالبي / ويكيميديا ​​كومنز CC BY 3.0

Cunningham was struck by the fact that the large crowds of locals who watched his excavation at Bharhut were deeply disappointed that he unearthed no buried treasure. He grumbled in his diary, “… few natives of India have any belief in disinterested excavations for the discovery of ancient buildings…. ” As at Sarnath, when he returned three years later, every remaining stone of the Bharhut stupa had been removed by locals to build their homes.

Indian neglect for antiquity also extended to more recent monuments. British visitors to the later Mughals at the Red Fort were appalled to find both the Diwan-e-Am and Diwan-e–Khas turned into slums, their semi-precious, inlaid stones stolen from their marble friezes. Aurangzeb’s Moti Masjid in the Red Fort, already dilapidated with foliage growing through it in the early 1800s, was restored by the British, as was Humayun’s tomb and the Jama Masjid. The Taj Mahal was the Mughal monument most beloved of the British, who repaired it from the 1780s onwards.

Cunningham’s Buddhist excavations coincided with British discoveries of important Hindu temple ruins, ranging from Mahabalipuram in the south to the Elephanta and Kanheri caves near Mumbai and Khajuraho, with its then shocking eroticism, in Madhya Pradesh. The most influential discovery was Ajanta, with its wonderful frescoes dating back to the 1 st century BC.

It was a young British cavalry officer who stumbled on Ajanta during a hunting expedition. He braved fierce tigers and even fiercer Bhil tribals, then the main occupants, to explore the caves. In 1836, the Asiatic Society published his report on Ajanta’s classical wonders, and it provoked much debate as to whether the frescoes were Hindu or Buddhist and why sites like this had been abandoned in such remote places.

As the frescoes were deteriorating, it was decided to copy as well as conserve them. A Major Robert Gill, an artistic soldier, arrived at Ajanta and spent the next 27 years copying the paintings. His entire collection was shipped off to be exhibited in London, but tragically destroyed in the Crystal Palace fire of 1866. Gill heroically returned to Ajanta and started all over again, but died a year later. His work was continued for the next 13 years by John Griffiths of Bombay’s JJ School of Art. The results were displayed at the Victoria and Albert Museum in London and, in an extraordinary run of bad luck, again destroyed by fire. But luckily this time they had been photographed and could be published. The frescoes went viral in London, with photos in various magazines and even an Ajanta-style ballet at Covent Garden performed by the great Russian ballerina, Anna Pavlova.

An original painting of a dancing girl at Ajanta and its copy by Robert Gill. الائتمان: ويكيميديا ​​كومنز

Ajanta encouraged the pioneering of a new approach to Indian art, giving it equal status with its Western counterparts. This was the life’s work of the art historian Ernest Havell, who came to India in 1890 as principal of the Madras School of Art and left 20 years later as head of the Calcutta School of Art. He celebrated the Indian aesthetic as being conceptual, rather than representational, its images stylised, not naturalistic as in Greco-Roman art, its emphasis on anonymous spirituality, rather than the individuality of its subject or the identity of the artist.

In 1910, at a stormy meeting of the Royal Society of Art in London, Havell clashed with his opponents, who maintained that India only excelled at decorative rather than fine art. Havell emphasised the continuity from ancient Ajanta down to recent Mughal miniatures of a distinctively Indian aesthetic, crediting the Indian artist with the ability ‘to see with the mind, not merely with the eye, to bring out an essential quality…” and to produce high art equal to anything in the West.

In recent times, the artistic discoveries of the Raj have raised questions of cultural ownership. The Indian equivalent of the Elgin Marbles demanded by Greece are the so-called Elliot marbles, also housed in the British Museum in London. The “marbles” are in fact pale limestone friezes from the Mauryan stupa at Amaravati in Andhra, intricately carved with scenes from the life of the Buddha. It was a Scottish revenue official, Sir Walter Elliot, who excavated the site in the 1840s and carted off some of the finest sculptures to the Madras Museum, whence some later found their way to the British Museum. Elliot’s career was typical of many Orientalists. While serving for 40 years as a civil servant in Madras, he was also a linguist, naturalist, ethnologist and numismatist and wrote learned books on everything from cobras and exotic birds to rare coins.

Today Elliot’s Marbles are displayed in a climate-controlled gallery specially created for them at the British Museum, as part of a global centre for the study of Buddhism. A demand for their return by the Archaeological Survey of India was politely declined in 2010. It’s hard to imagine that they would really be better appreciated or conserved in the land of their birth. The stupa at Amaravati is sadly neglected, while the Madras Museum’s collection of its sculptures is one of its least visited rooms. The cultural treasures the British took home with them are only a tiny fraction of what they salvaged, protected and left behind for us.


Don’t get us wrong. The Buddhist caves carved into the mountainside at Ajanta are cool. It’s just that after a while, you experience a sort of repetitious sensory overload (“Oh, this one has a Buddha at the back…just like the others…”).

So, in case you don’t have the time or inclination to explore all 30, we’ve listed our must-sees.

Kick things off with this cave, famous for its elaborately painted vihara, or monastery. The mural depicts two bodhisattvas: Avalokitesvara, the personification of compassion, and Vajrapani, the spiritual energy of the enlightened mind. These flank the doorway to the antechamber.

The Buddha, awash in green light and centered in the large shrine at the rear, sits cross-legged in the dharmachakrapravartana mudra teaching position and was sponsored by Emperor Harisena. In this mudra, the thumb and index finger of both hands touch at their tips to form a circle. This circle represents the Wheel of Dharma, or in metaphysical terms, the union of method and wisdom.

The coolest part of this cave is its ceiling, dominated by a large mandala decorated with birds, flowers, fruit and abstract designs.

This is the largest vihara in the complex, but it was a bit too ambitious — part of the ceiling is said to have collapsed and it wasn’t ever completed. Look up to see the undulating ceiling, which features a cool wavy pattern created by lava flows.

The exterior is gorgeous. We learned that all of these caves were carved top-down. The entranceway features sculptures of lunging lions, maidens clutching trees and dwarves adorned with garlands.

To the right is a bas-relief of a bodhisattva as Reliever of Eight Great Perils. Curious what those are? They were common dangers for pilgrims of the past: bandits, snakes, elephants, lions, disease, floods, forest fires and false imprisonment in foreign lands.

Enter through an impressive double portico richly carved with elephants, lions, lotuses and small stupas.

An oblong vihara monastery from the late 5th century, the garbha griha (inner sanctuary) contains a Buddha statue in a preaching pose, as well as a seated Buddha sheltered by the Naga Muchalinda, a snake-like being who protected him from the elements after his enlightenment.

This chaitya, or prayer hall, from the 1st century BCE is built on a rectangular plan. The interior is divided into three aisles by 21 unadorned octagonal columns.

A large stupa stands on a high cylindrical base at the center of the apse. Because figurative sculptures of the Buddha were not produced during this period, stupas were built to enshrine sacred relics that were most often worshipped and became synonymous with chaityas.

The inside of this cave is two stories high, with a barrel vault ceiling on which rafters and purlins are carved like a wooden building. Although those curious devices are structurally unnecessary, they’re an aesthetic method to mimic the interior spaces of temples.

A Theravada prayer hall, it’s thought to be the oldest cave temple at Ajanta, dating to the 2nd century BCE.

According to one of the inscriptions found in the hall, this cave was designed to “cause the attainment of well-being by good people as long as the sun dispels darkness by its rays!”

Its large central hall is supported by 20 octagonal pillars and bounded by 17 dormitory cells, where the monks slept.

A panel above the doorway depicts the seven Manushi Buddhas (fully illuminated beings in human form).

The detailed exterior carvings to the right of the façade are incredible. A pair of yakshas (nature spirits) are sculpted on either side of the entrance.

The arched roof of the interior hall is carved in imitation of wooden ribs, mimicking the interior spaces of structural temples.

An elaborate standing figure of Buddha, whose umbrella-like crown almost touches the vaulted ceiling, emerges from the mouths of sea monsters.

A reclining Buddha, representing his moment of death prior to attaining nirvana, is a popular feature here. (Wally calls this the “Sleepy-time Buddha.”)

The cave’s stupa has a sculpted figure of Buddha in pralamba padasana mudra, with both feet on the ground and legs apart, as if seated on a throne.

We saw a Sikh man practicing circumambulation (literally, “walking in circles”), a devotional practice where you walk around a sacred object like this stupa, chanting a mantra.

LUNCH WITH HANUMAN

After a morning of exploring the Ajanta Caves, we stopped at a dhaba roadside restaurant for some chana masala

On the way back to Aurangabad, we stopped at a dhaba, or roadside restaurant, for lunch and enjoyed a delicious meal of chana masala seasoned with cinnamon, chile paneer (homemade cheese) and chapatti (flatbread).

A monument to the monkey god Hanuman stood across the road. Hanuman is regarded as a the perfect symbol of selflessness and loyalty.

Worshipping him helps counter any bad karma you’ve racked up by acting selfishly. Hindus believe he bestows fortitude and the strength to overcome the trials of life. -Duke


Oldest historical structures in India known for their exquisite architecture

Our ancient roots dating back to hundreds of centuries is not something we ponder over too frequently. But if at all we do, the sheer richness and diversity of our history is bound to leave us spellbound. With primitive tools and calculation methods in a time when modern day building materials and technology was unimaginable, our forefathers built temples and cities that have survived till date.

Such ancient structures, which once formed the nerve-centre of trade, education, religion or culture, bowl us over with their engineering ingenuity, sculpture and designs even in this modern era of science and technology. We list some such oldest architectural marvels we can proudly look back to and call our own in this I-day special.

Centre Asks States to Ensure Lockdown Opening Up is ⟊refully Calibrated' No Crowding in Markets

With a decline in the number of active cases, many states and UTs have started relaxing restrictions. I would like to highlight that the decision to impose or ease restrictions has to be taken, based on the assessment of the situation at the ground level, Union Home Secretary said.

Legendary Indian Athlete Milkha Singh Passes Away Aged 91, After Battle With Covid

Legendary Indian athlete Milkha Singh, popularly known as ɿlying Sikh, passed away in a local hospital here at 11.30 pm on Friday, said a statement from the Post Graduate Institute of Medical Education & Research (PGIMER), Chandigarh, where he was being treated for Covid-related complications. Milkha was 91, and is survived by a son, ace golfer Jeev Milkha Singh, and three daughters. A former India volleyball captain, she was 85, and she too was affected by Covid and related complications.

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ميلاديحصل الجار المجنون على الكرمة عندما اشترى الزوجان.

بعد الكثير من الدراما والعديد من زيارات الشرطة ، كانت لها اليد العليا. Who would’ve thought that a small piece of paper has such power?

Raebareli Sees Slow Vaccination. Akhilesh's Remark Among Reasons, Say Locals

Against a projected population of almost 39 lakh as on date, only 2.12 lakh jabs have been given in Raebareli. Considering that 1.81 lakh of them are first doses, only about 4.6% of the district’s population has got jabbed so far.

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Delhi Unlock: The statement of the DDMA also added that all schools, colleges, educational, training and coaching institutions will remain closed.

SC Ignores Law, Misinterprets Delhi HC’s Vital UAPA Bail Orders

This means that the Delhi HC’s orders cannot be cited by any other persons accused of offences under the UAPA.


Ajanta, cave 10, chaitya-griha, with votive stupa

The Ajanta Caves in Aurangabad district of Maharashtra, India are about 30 rock-cut Buddhist cave monuments which date from the 2nd century BCE to about 480 or 650 CE. The caves include paintings and sculptures described by the government Archaeological Survey of India as "the finest surviving examples of Indian art, particularly painting", which are masterpieces of Buddhist religious art, with figures of the Buddha and depictions of the Jataka tales. The caves were built in two phases starting around the 2nd century BCE, with the second group of caves built around 400–650 CE according to older accounts, or all in a brief period of 460 to 480 according to the recent proposals of Walter M. Spink. The site is a protected monument in the care of the Archaeological Survey of India, and since 1983, the Ajanta Caves have been a UNESCO World Heritage Site.

The Ajanta caves are cut into the side of a cliff that is on the south side of a U-shaped gorge on the small river Waghur, and although they are now along and above a modern pathway running across the cliff they were originally reached by individual stairs or ladders from the side of the river 10–35 m below.

The area was previously heavily forested, and after the site ceased to be used the caves were covered by jungle until accidentally rediscovered in 1819 by a British officer on a hunting party. They are Buddhist monastic buildings, apparently representing a number of distinct "monasteries" or colleges. The caves are numbered 1 to 28 according to their place along the path, beginning at the entrance. Several are unfinished and some barely begun and others are small shrines.

The caves form the largest corpus of early Indian wall-painting other survivals from the area of modern India are very few, though they are related to 5th-century paintings at Sigiriya in Sri Lanka. The elaborate architectural carving in many caves is also very rare, and the style of the many figure sculptures is highly local, found only at a few nearby contemporary sites, although the Ajanta tradition can be related to the later Hindu Ellora Caves and other sites.

The four completed chaitya halls are caves 9 and 10 from the early period, and caves 19 and 26 from the later period of construction. All follow the typical form found elsewhere, with high ceilings and a central "nave" leading to the stupa, which is near the back, but allows walking behind it, as walking around stupas was (and remains) a common element of Buddhist worship (pradakshina). The later two have high ribbed roofs, which reflect timber forms, and the earlier two are thought to have used actual timber ribs, which have now perished. The two later halls have a rather unusual arrangement (also found in Cave 10 at Ellora) where the stupa is fronted by a large relief sculpture of the Buddha, standing in Cave 19 and seated in Cave 26.

Caves 9 and 10 are the two chaitya halls from the first period of construction, though both were also undergoing an uncompleted reworking at the end of the second period. Cave 10 was perhaps originally of the 1st century BCE, and cave 9 about a hundred years later. كما أن الكهوف الصغيرة & quotshrinelets & quot التي تسمى الكهوف 9A إلى 9D و 10A تعود أيضًا إلى الفترة الثانية ، وقد تم إنشاؤها من قبل الأفراد.

تشمل اللوحات الموجودة في الكهف 10 بعضًا ما تبقى من الفترة المبكرة ، والعديد منها من برنامج تحديث غير مكتمل في الفترة الثانية ، وعدد كبير جدًا من الصور المتطفلة المتأخرة الأصغر ، تقريبًا جميع تماثيل بوذا والعديد منها مع نقوش متبرع بها من الأفراد. غالبًا ما تم تجنب الإفراط في طلاء برنامج & quotofficial & quot ، وبعد استخدام أفضل المواضع ، يتم إخفاء مواقع أقل بروزًا لم يتم رسمها بعد ، ربما كان إجمالي هؤلاء (بما في ذلك المفقودون الآن) أكثر من 300 ، وأيدي العديد من الفنانين المختلفين هي مرئي.


لمحات عامة

على الرغم من وجود العديد من الكتب الفنية على لوحات أجية للجمهور العام مع صور جميلة ، إلا أن الأعمال العلمية التي تقدم لمحات عامة دقيقة وشاملة عن الموقع محدودة نوعًا ما. بالنسبة للحسابات التفصيلية حول السمات المعمارية للكهوف ، فإن التقارير المبكرة عن بورغيس 1879 وفيرغسون وبورجس 1880 وبورجس 1883 توفر معلومات مفيدة. قام Spink 2007 ، والذي يتكون من مجلدات متعددة للمؤلف على الموقع ، بمزيد من التفصيل لروايات بورغيس عن الكهوف بناءً على دراسته التي استمرت نصف قرن في الموقع. يقدم Ghosh 1967 لمحة عامة شاملة عن الهندسة المعمارية والنحت واللوحات في أجاية. للحصول على نظرة عامة أكثر إحكاما على الموقع ، يتمتع Mitra 1992 بسمعة طيبة لسنوات عديدة ، على الرغم من أن التسلسل الزمني للكهوف وتحديد هوية اللوحات في هذا الكتاب لم يتغير منذ إصداره الأول في عام 1956. وتزويدنا بمعلومات كافية ومحدثة عن الموقع والنحت واللوحات على أساس المنحة الدراسية الحديثة.

بيرجس ، جيمس. ملاحظات على معابد بودها الصخرية في أجانتا ، ولوحاتها ومنحوتاتها ، وعلى لوحات كهوف باغ ، وأساطير بودها الحديثة ، و. بومباي: الحكومة المركزية ، 1879.

واحدة من أقدم الروايات العلمية عن كهوف أجية لعالم رائد في علم الآثار الهندي. يتضمن الكتاب روايات وصفية إلى حد ما للكهوف ، ولوحات في كل كهف ، ونقوش. بالإضافة إلى النص ، يحتوي الكتاب أيضًا على العديد من الرسومات ومخططات الارتفاع لإظهار مكان اللوحات وبعض الحك للنقوش.

بيرجس ، جيمس. تقرير عن معابد الكهوف البوذية ونقوشها ، المسح الأثري لغرب الهند. المجلد. 4. لندن: تروبنر ، 1883.

نُشر هذا المجلد كمجلد مكمل لـ Fergusson and Burgess 1880. ويتضمن فصلاً (ص 43-59) يصف التفاصيل المعمارية لكل كهف في أجاية مع العديد من المخططات والرسوم التوضيحية. يسرد الفصل 14 (ص 116 ، 124-138) أيضًا أربعة وعشرين نقشًا للأجاة في الكهوف 9 ، 10 ، 16 ، 20 ، 26 مع النصوص والترجمات. تم نشر طبع من قبل Indological Book House (Varanasi) في عام 1964.

فيرجسون وجيمس وجيمس بيرجس. معابد الكهوف في الهند. لندن: دبليو إتش ألين ، ١٨٨٠.

يحتوي هذا المجلد الأول الشامل عن المعابد المنحوتة في الصخر في الهند على ثلاثة فصول للكهوف المبكرة أو كهوف "حنينا" ، فيما بعد أو كهوف "ماهيانا" والكهوف "الأحدث" (القرن السابع الميلادي) في أجايا (ص ٢٨٠-٣٤٦). يتضمن كل فصل وصفًا تفصيليًا للكهوف واللوحات الجدارية والنقوش الباقية. تم إعادة طبع من قبل مطبعة جامعة كامبريدج في عام 2013.

Ghosh، A.، ed. اجانتا الجداريات. نيودلهي: المسح الأثري للهند ، 1967.

على عكس العديد من "الكتب الفنية" على لوحات أجية التي تحتوي على العديد من اللوحات ، يوفر لنا هذا المنشور ASI نظرة عامة شاملة عن موقع أجاية والنحت واللوحات ، مثل الخلفية التاريخية للموقع ، والدراسات المبكرة ، والتحليل العلمي للرسم. المواد. تعتبر الببليوغرافيا المرفقة مفيدة أيضًا ، حيث إنها تسرد الدراسات المبكرة عن أجاية في أواخر القرن التاسع عشر وأوائل القرن العشرين.

هنتنغتون ، سوزان ل. ، وجون سي هنتنغتون. فن الهند القديمة: بوذي ، هندوسي ، جاين. نيويورك وطوكيو: Weather Hill ، 1985.

يحتوي هذا المجلد الشامل عن تاريخ الفن الهندي القديم على فصل (الفصل 12) عن عمارة الكهوف البوذية من القرن الخامس حتى القرن السابع الميلادي. يوفر نظرة عامة جيدة على اللوحات والنحت والهندسة المعمارية للكهوف في أجايا وكذلك على المواقع ذات الصلة بما في ذلك باغ وكانهيري وأورانجاباد وإيلورا. الببليوغرافيا المرفقة مفيدة لفهم المنح الدراسية الحديثة حول هذا الموضوع.

جامخدكار ، آرفيند ب. اجانتا. أكسفورد: مطبعة جامعة أكسفورد ، 2013.

أحدث دليل إرشادي عن أجية لمدير سابق لآثار ولاية ماهاراشترا. بالإضافة إلى أوصاف كل كهف (الفصل 5) ، فإنه يلخص بشكل جيد القضايا الرئيسية للمواقع بما في ذلك الرعاية والتطوير المعماري وتاريخ الكهوف (ج. 200 قبل الميلاد - 525 م في رأيه) والتعرف على اللوحات والنحت من خلال تقديم نتائج البحوث الحديثة.

ميترا ، ديبالا. اجانتا. الطبعة العاشرة. نيودلهي: المسح الأثري للهند ، 1992.

دليل مدمج ومتاح على نطاق واسع نشرته ASI. يوفر معلومات عامة ولكن كافية عن تاريخ الكهوف والتماثيل واللوحات الرئيسية لكل كهف. وفقًا للتسلسل الزمني التقليدي ، فإنه يؤرخ المرحلة المتأخرة من الكهوف إلى ما بين أواخر القرن الخامس والقرن السابع الميلادي ويقترح استمرار الموقع خلال القرنين الثامن والتاسع الميلادي.

سبينك ، والتر. م. اجانتا: التاريخ والتنمية. المجلد. 5 ، كهف من الكهف. ليدن وهولندا وبوسطن: بريل 2007.

يوفر هذا المجلد ، الذي يشكل جزءًا من مجلدات Spink الخمسة في Ajanta ، السمات الرئيسية للأعمدة ومفصلات الأبواب والثقوب وخطط كل كهف بحيث تدعم التسلسل الزمني القصير للموقع (للاطلاع على التسلسل الزمني القصير ، انظر Spink 1967 و Spink 2005-2009 ، تحت التسلسل الزمني للكهوف).

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شاهد الفيديو: ALL ABOUT AJANTA CAVES-1 Hindi (يونيو 2022).